रांची: झारखंड में सोहराई पेंटिंग के बाद अब राज्य के 28 अन्य पारंपरिक और विशिष्ट उत्पादों को GI टैग दिलाने की दिशा में ठोस पहल शुरू हो गई है। इस अभियान में झारखंड सरकार और नाबार्ड (NABARD) मिलकर काम कर रहे हैं। खास बात यह है कि देवघर का प्रसिद्ध पारंपरिक व्यंजन ‘अड्डे मटन’ भी इस सूची में शामिल कर लिया गया है। अड्डे मटन को देवघर अड्डे एसोसिएशन की ओर से आधिकारिक रूप से नामांकित किया गया है।
पीढ़ियों से चली आ रही इस अनोखी रेसिपी को जनवरी महीने में औपचारिक रूप से सूचीबद्ध किया गया। इसके मूल्यांकन के लिए चेन्नई से आई विशेषज्ञ टीम ने झारखंड का दौरा किया और एनएलयू रांची में इसकी प्रस्तुति भी देखी। फिलहाल यह व्यंजन चार महीने के मूल्यांकन दौर से गुजर रहा है। यदि इस दौरान किसी अन्य परिवार या समूह की ओर से मूल रेसिपी को लेकर कोई आपत्ति नहीं आई, तो अड्डे मटन को झारखंड का विशिष्ट उत्पाद मानते हुए GI टैग प्रदान कर दिया जाएगा।
मिट्टी के अट्टे से जुड़ी है अड्डे मटन की पहचान
देवघर में जिस पारंपरिक मिट्टी के बर्तन में तय मात्रा में मटन परोसा जाता है, उसे ‘अट्टे’ कहा जाता है। इसी परंपरा से इस व्यंजन का नाम अड्डे मटन पड़ा। आज यह व्यंजन बाबा नगरी देवघर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई राष्ट्रीय स्तर की हस्तियों ने भी इसके स्वाद की तारीफ की है।
सोहराई पेंटिंग के बाद दूसरा बड़ा कदम
वर्तमान में झारखंड में केवल सोहराई पेंटिंग को ही GI टैग प्राप्त है, जो 14 सितंबर 2021 को मिला था। इसे ट्राइफेड द्वारा नामांकित किया गया था और यह टैग 10 वर्षों के लिए मान्य है। अब राज्य सरकार अड्डे मटन समेत 28 अन्य उत्पादों को भी इसी तरह की वैश्विक पहचान दिलाने की तैयारी में है।
असली अड्डे मटन की पारंपरिक पहचान
अड्डे मटन के जनक माने जाने वाले बुद्धिनाथ मिश्र उर्फ बुद्धन बाबा बताते हैं कि असली अड्डे मटन में न तो प्याज डाला जाता है और न ही लहसुन। आज बाजार में बिकने वाले कई व्यंजनों में इनकी गंध आने लगी है, जो इसकी मूल पहचान से अलग है। वे बताते हैं कि पहले एक दिन में 7–8 क्विंटल अड्डे मटन तैयार होता था, लेकिन अब यह मात्रा घटकर 2–3 क्विंटल प्रतिदिन रह गई है।
GI टैग से मिलेगी पहचान और सुरक्षा
नाबार्ड की सीजीएम दीपमाला घोष के अनुसार GI टैग किसी भी उत्पाद की मौलिकता और क्षेत्रीय पहचान को सुरक्षित करने का सशक्त माध्यम है। इससे स्थानीय उत्पादकों को बेहतर दाम, बाजार में पहचान और आजीविका की सुरक्षा मिलेगी। केंद्रीय मंत्रालय की जांच और मंजूरी के बाद इन उत्पादों को आधिकारिक GI टैग प्रदान किया जाएगा।

