भोपाल: भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई कार्यकारिणी के गठन को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इस नई टीम में मध्य प्रदेश के कई प्रमुख नेताओं को जगह मिलने के कयास लगाए जा रहे हैं। खासकर पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और सांसद विष्णुदत्त शर्मा (वीडी शर्मा) की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई हालिया मुलाकात के बाद उनके नाम पर अटकलों का बाजार गर्म है। केंद्रीय नेतृत्व के सामने जातीय व क्षेत्रीय संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती है, जिसके चलते प्रदेश से ब्राह्मण, ओबीसी, आदिवासी और दलित वर्गों के अनुभवी नेताओं को राष्ट्रीय पटल पर लाया जा सकता है।
पीएम से मुलाकात के बाद वीडी शर्मा की दावेदारी मजबूत
संभावित दावेदारों में वीडी शर्मा का नाम सबसे आगे चल रहा है। मध्य प्रदेश में लंबे समय तक प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और चुनावी प्रबंधन में अपनी क्षमता साबित की है। प्रधानमंत्री से हुई उनकी विशेष मुलाकात को उनके अगले बड़े राजनीतिक कदम से जोड़कर देखा जा रहा है। उनका संगठनात्मक अनुभव और ब्राह्मण वर्ग से होना उनके पक्ष में मजबूत आधार तैयार करता है।
कविता पाटीदार: महिला और ओबीसी वर्ग का संतुलन
राज्यसभा सांसद कविता पाटीदार को भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह मिलने की संभावना जताई जा रही है। प्रदेश संगठन में महामंत्री रह चुकीं पाटीदार के पास संसदीय और सांगठनिक दोनों अनुभव मौजूद हैं। उनके नाम से पार्टी एक साथ महिला और ओबीसी दोनों वर्गों को साध सकती है। महिला मतदाताओं के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देना पार्टी की रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।
गजेंद्र पटेल और लालसिंह आर्य: सामाजिक विस्तार पर नजर
आदिवासी और दलित वर्ग में पैठ मजबूत करने के लिए सांसद गजेंद्र पटेल और वरिष्ठ नेता लालसिंह आर्य के नामों पर विचार हो सकता है:
गजेंद्र पटेल: आदिवासी बहुल इलाकों में मजबूत पकड़ रखने वाले गजेंद्र पटेल को शामिल कर भाजपा केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों के आदिवासी वोट बैंक को भी सकारात्मक संदेश देना चाहती है।
लालसिंह आर्य: भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चे के पूर्व अध्यक्ष लालसिंह आर्य को जिम्मेदारी देकर पार्टी दलित वर्ग में अपना आधार और मजबूत कर सकती है, जो उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
उपचुनाव के नतीजों का भी दिखेगा असर
हाल ही में हुए दतिया विधानसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद केंद्रीय नेतृत्व बेहद सतर्कता बरत रहा है। राष्ट्रीय टीम के चयन में केवल जातीय समीकरण ही नहीं, बल्कि नेताओं का चुनावी प्रबंधन और स्वीकार्यता भी मुख्य कसौटी होगी। आगामी 2028 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए केवल उन्हीं चेहरों को तवज्जो मिलने की उम्मीद है जो संगठन को नई ऊर्जा दे सकें।

