सब्र की परीक्षा न लें…’ राज्य का दर्जा बहाल करने पर केंद्र को उमर अब्दुल्ला की दो टूक चेतावनी

Omar Abdullah on Statehood जम्मू : जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला (Omar Abdullah) ने केंद्र सरकार की नीतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए एक बड़ा राजनीतिक बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर उनके और प्रदेश की जनता के “सब्र” को केंद्र सरकार उनकी कमजोरी समझने की भूल न करे। हजरतबल में अपने दादा-दादी (शेख अब्दुल्ला और बेगम अकबर जहां) की मजार पर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उमर अब्दुल्ला ने केंद्र से तीखा सवाल पूछा कि आखिर राज्य का दर्जा वापस देने का वह “उपयुक्त समय” कब आएगा और इसकी स्थिति कब साफ होगी?

Omar Abdullah on Statehood :लद्दाख से बात, तो जम्मू-कश्मीर से परहेज क्यों?

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र की दोहरी नीति पर सवाल उठाते हुए कहा, “यदि केंद्र सरकार लद्दाख के प्रतिनिधिमंडल और वहां के लोगों से बातचीत की मेज पर बैठने को तैयार है, तो फिर जम्मू-कश्मीर के आवाम और यहां की चुनी हुई सरकार से संवाद करने में क्या हिचकिचाहट है?” अपनी दादी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने हमेशा धैर्य रखने की सीख ली है, लेकिन सब्र का मतलब चुपचाप बैठना या अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज न उठाना कतई नहीं है। उन्होंने साफ किया कि संयम ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है और यही अंततः कामयाबी का जरिया बनेगा।

सत्ता में होने के बावजूद जंतर-मंतर पर प्रदर्शन क्यों?

सीएम उमर ने केंद्र सरकार को आत्ममंथन (Introspection) करने की नसीहत दी। उन्होंने सवाल उठाया कि जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार को सत्ता में आए डेढ़ साल से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी, आगामी 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जाकर विरोध प्रदर्शन करने की नौबत क्यों आ रही है?

उमर अब्दुल्ला ने भावुक होते हुए कहा कि उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य और साख को दांव पर लगाकर हमेशा बंदूक या हिंसा के बजाय लोकतांत्रिक बातचीत का रास्ता चुना, जबकि वे जानते थे कि घाटी के संवेदनशील माहौल में यह फैसला उनके राजनीतिक करियर के लिए बेहद जोखिम भरा साबित हो सकता है।

“हम भारत के ताज हैं, पैर की जूती नहीं” — फारूक अब्दुल्ला

इस दौरान नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने भी केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने 24 जून 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में दिल्ली में हुई सर्वदलीय बैठक का जिक्र किया। फारूक अब्दुल्ला ने याद दिलाया, “उस बैठक में पीएम मोदी ने ‘दिल्ली की दूरी और दिल की दूरी’ को मिटाने तथा विश्वास की कमी को दूर करने का वादा किया था। आज मैं पूछता हूं कि क्या वाकई वह दूरी कम हो सकी है?” उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों का अपना आत्मसम्मान है, “वे भारत के सिर का ताज हैं, किसी के पैर की जूती नहीं।”

उपचुनाव और स्थानीय निकाय चुनावों पर दो टूक

फारूक अब्दुल्ला ने बीजेपी नीत केंद्र सरकार पर उपराज्यपाल (LG) कार्यालय के जरिए जम्मू-कश्मीर की लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था को पंगु बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अगर राजभवन के माध्यम से ही लोगों को प्रताड़ित करना था, स्थानीय युवाओं को नौकरियों से निकालना था और बुलडोजर संस्कृति चलानी थी, तो फिर प्रदेश में विधानसभा चुनाव कराने का नाटक क्यों किया गया?

उमर अब्दुल्ला ने भी पिता के सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि केंद्र को पहले ही साफ कर देना चाहिए था कि वे एक ऐसी सरकार का गठन चाहते हैं जिसके हाथ पीछे बंधे हों और जिसे ऐसे नौकरशाह सौंपे जाएं जो चुनी हुई सरकार के फैसलों को लागू ही न करें। स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों पर स्थिति स्पष्ट करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “हम भी सूबे में चुनाव चाहते हैं, लेकिन इन चुनावों को कराने का सबसे उपयुक्त समय क्या होगा, इसका फैसला दिल्ली में बैठी सरकार नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की चुनी हुई लोकप्रिय सरकार ही करेगी।”

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