नई दिल्ली: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के लंबे कार्यकाल को शीर्ष अदालत में चुनौती दी गई है। याचिका में बीसीआई नियमों के तहत अध्यक्ष के दो साल के निर्धारित कार्यकाल का हवाला देते हुए अप्रैल 2025 की उस गजट अधिसूचना को रद्द करने की मांग की गई है, जिसके जरिए कार्यकाल को 2030 तक बढ़ा दिया गया। याचिकाकर्ता ने मिश्रा को पद से हटाने, पारदर्शी तरीके से नए चुनाव कराने, चेयरमैन के कार्यकाल की अधिकतम सीमा तय करने और बीसीआई के वित्तीय मामलों की स्वतंत्र जांच व ऑडिट कराने का अनुरोध किया है। इसके साथ ही, उनके राजनीतिक जुड़ाव के संदर्भ में संस्था की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता अधिवक्ता योगमाया एमजी ने स्पष्ट किया है कि बीसीआई नियमों का नियम 12(2) चेयरमैन के कार्यकाल की अवधि केवल दो वर्ष निर्धारित करता है।
2030 तक कार्यकाल बढ़ाने वाली अधिसूचना को दी गई चुनौती
अधिवक्ता दीपक प्रकाश के माध्यम से दाखिल याचिका में अप्रैल 2025 की उस गजट अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसके माध्यम से कथित तौर पर मनन कुमार मिश्रा का कार्यकाल 2030 तक बढ़ा दिया गया। याचिकाकर्ता का तर्क है कि बीसीआई को संचालित करने वाले वैधानिक नियमों के विपरीत केवल एक प्रशासनिक अधिसूचना के आधार पर अध्यक्ष का कार्यकाल नहीं बढ़ाया जा सकता।
नियमों के तहत दो साल की अवधि निर्धारित
याचिका में उल्लेख किया गया है कि बीसीआई नियमों का नियम 12(2) चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लिए दो साल की अवधि तय करता है। यह अवधि सदस्यता बने रहने तक या दो साल पूरा होने तक लागू रहती है। प्रशासनिक स्तर पर जारी कोई भी अधिसूचना नियमों में तय इस समय सीमा को बढ़ाने का आधार नहीं बन सकती।
21 अप्रैल 2025 की गजट अधिसूचना निरस्त करने का अनुरोध
याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत से 21 अप्रैल 2025 को जारी गजट अधिसूचना को रद्द करने और बीसीआई को इसे तुरंत वापस लेने या निरस्त करने का निर्देश देने की गुहार लगाई है।
लंबे समय से एक ही व्यक्ति के पास पद रहने पर उठाये गए सवाल
याचिका में संस्थागत संतुलन को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि नियम 12(2) में दो साल का कार्यकाल तय है, लेकिन लगातार चुने जाने पर कोई अधिकतम सीमा न होने के कारण बीते 12 वर्षों से यह पद एक ही व्यक्ति के पास है। इतनी लंबी अवधि तक एक ही व्यक्ति का नेतृत्व में रहना अधिवक्ता अधिनियम के तहत परिकल्पित प्रतिनिधिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है। अधिनियम की धारा 4(1)(c) के अनुसार, प्रत्येक राज्य बार काउंसिल बीसीआई के गठन में योगदान देती है। ऐसे में इस राष्ट्रीय संस्था का सर्वोच्च पद अनिश्चितकाल के लिए किसी एक व्यक्ति या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
अध्यक्ष को हटाने और नए चुनाव कराने की मांग
याचिका में मनन कुमार मिश्रा को चेयरमैन पद से हटाने और निष्पक्ष निगरानी में तय समय सीमा के भीतर नए सिरे से चुनाव कराने की मांग शामिल है।
कार्यकाल की अधिकतम सीमा तय करने का सुझाव
याचिकाकर्ता ने अध्यक्ष पद के लिए किसी भी व्यक्ति के कुल कार्यकाल की अधिकतम सीमा निश्चित करने का आग्रह किया है। इसके अलावा, सभी राज्यों और क्षेत्रों को समान अवसर देने के लिए रोटेशन प्रणाली और कूलिंग-ऑफ अवधि लागू करने का सुझाव दिया गया है, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों के प्रतिनिधि संस्था का नेतृत्व कर सकें।
पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति का प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट से एक स्वतंत्र समिति गठित करने का अनुरोध किया गया है, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश करें। इस समिति के सहयोग के लिए सीएजी (CAG) द्वारा नामित ऑडिटर और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करने का प्रस्ताव है।
वित्तीय मामलों और ट्रस्ट की जांच की अपील
याचिका में बीसीआई ट्रस्ट 'PEARL-FIRST' के कामकाज और वित्तीय लेन-देन के साथ-साथ ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन से जुड़ी आय की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है।
फंड और लेन-देन के निष्पक्ष ऑडिट की मांग
वैधानिक फंड, परीक्षा से प्राप्त आय, वेंडर कॉन्ट्रैक्ट्स और संबंधित पक्षों के लेन-देन का निर्धारित समय सीमा में ऑडिट कराने का आग्रह किया गया है।
अंतरिम व्यवस्था का सुझाव
यदि शीर्ष अदालत वर्तमान अध्यक्ष को पद से हटाने का आदेश देती है, तो व्यवस्था संभालने के लिए एक स्वतंत्र प्रशासनिक समिति गठित करने का अंतरिम प्रस्ताव रखा गया है।
2012 से जारी कार्यकाल का उल्लेख
याचिका के अनुसार, मनन कुमार मिश्रा 2012 से बीसीआई चेयरमैन के रूप में कार्यरत हैं। 2014 में कुछ समय के लिए पद छोड़ने के बाद वे नवंबर 2014 में दोबारा चुने गए और तब से लगातार पद पर बने हुए हैं। मार्च 2025 में वे फिर निर्विरोध चुने गए, जो कि उनका सातवां कार्यकाल है।
राजनीतिक भूमिका पर ध्यान आकृष्ट
याचिका में 2024 में पटना से संबंध रखने वाले मिश्रा के भाजपा द्वारा नामांकित होकर राज्यसभा सदस्य बनने का भी उल्लेख किया गया है और शीर्ष पद पर रहते हुए उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर सवाल उठाए गए हैं।
संस्थागत निष्पक्षता और पारदर्शिता पर जोर
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह चुनौती केवल व्यक्तिगत असहमति या राजनीतिक जुड़ाव के कारण नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य वैधानिक शक्तियों के केंद्रीकरण, नियमों के उल्लंघन, पारदर्शिता की कमी और अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत स्थापित लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा करना है।

