Sunday, June 16, 2024

आंदोलनों का बलपूर्वक कुचला जाना लोकतंत्र की मौत?

7 अगस्त को सांसद राहुल गांधी ने एक बड़ा बयान दिया. राहुल गांधी ने कहा कि देश में लोकतंत्र की मौत हो गई है.सरकार ने सभी संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया है.उन्होंने बीजेपी की चुनावी जीत की तुलना जर्मनी के तानाशाह हिटलर की चुनावी जीत से की और कहा कि सिस्टम अगर मुझे दे दिया जाए तो जीत कर मैं भी दिखा दूंगा. राहुल के इस बयान पर बीजेपी की प्रतिक्रिया आना लाज़िम थी और वो आई भी. बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने लोकतंत्र पर कांग्रेस को घेरते हुए सवाल किया कि क्या कांग्रेस पार्टी में लोकतंत्र है? लेकिन लोकतंत्र पर ये बहस यहीं सीमित नहीं हो जाती. सत्ता पक्ष और विपक्ष की दलीलें एक तरफ, और ये सवाल एक तरफ कि क्या लोकतंत्र में सब कुछ ठीक है?
ये तो सब जानते और मानते हैं कि लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है तीन स्तंभ – मज़बूत विपक्ष, स्वतंत्र पत्रकारिता और स्वतंत्र न्यायपालिका. पत्रकारिता और न्यायपालिका को एक तरफ कर बात अगर विपक्ष की करें तो बड़ा दिलचस्प है कि विपक्ष कभी नज़र ही नहीं आता और जब आता है तो उसका सर कुचलने के लिए सत्ता पक्ष द्वारा इस्तेमाल बल प्रयोग चर्चा का विषय बन जाता है. वैसे तो पिछले 8 सालों में ऐसे कई मौक़े आए जब सत्ता पक्ष पर विपक्ष को कुचलने के आरोप लगे लेकिन कुछ एक मामलों पर जोरदार बहस का सिलसिला चला. पहले बात करते हैं बदायूं की जहां बलात्कार पीड़िता की लाश बिना उसके घरवालों की इजाज़त जबरन जला दी गई थी. मानवता को शर्मसार करने वाली इस घटना पर पूरा देश हैरान था. हर राजनीतिक दल उस बेटी के परिवार से मिलने जाना चाहता था जिसके साथ जुल्म की इंतहा हुई थी लेकिन उत्तर प्रदेश की मौज़ूदा सरकार ने तय कर लिया था कि विपक्ष का इरादा परिवार को सांत्वना देने का नहीं है बल्कि राजनीति करने का है. वैसे देखा जाए तो राजनीति करना विपक्ष का अधिकार ही नहीं मूल काम भी है अगर राजनीतिक दल राजनीति नहीं करेंगे तो क्या करेंगे. खैर सरकार की सोच का नतीजा ये हुआ कि बदायूं की ओर बढ़ने वाले हर नेता को पुलिसिया दमन का सामना करना पड़ा. आरएलडी के जयंत चौधरी और उनके साथियों को ऐसा रोका गया कि धक्का-मुक्की में जयंत दीवार से जा टकराए और उनको बचाने के चक्कर में कई कार्यकर्ताओं को लाठी-डंडे खाने पड़े. टीएमसी के नेता और सांसदों से भी बदसलूकी हुई, उन्हें धक्के दिए गए घसीटा गया. भीम आर्मी के चंद्रशेखर आज़ाद रावण को हिरासत में लिया गया. कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, जो रोके जाने पर पैदल ही जाने की जिद कर रहे है उनके साथ भी धक्का मुक्की हुई और वो सड़क पर गिर गए. कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के कपड़े खींचे गए जिसके लिए बाद में पुलिस ने माफी भी मांगी. कुल मिलाकर कहें तो सरकार के इशारे पर पुलिस ने नेताओं के साथ ऐसा सलूक किया जैसा किसी अपराधी के साथ किया जाता है. बदायूं के बाद अब लौटते हैं हाल फिलहाल की घटनाओं की ओर तो दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से ईडी पूछताछ का विरोध कर रहे युवा कांग्रेस नेता बी श्रीनिवास को जिस तरह बाल पकड़ के पुलिस ने गाड़ी में बैठाया वो सभी को याद होगा.7 अगस्त को महंगाई के ख़िलाफ़ कांग्रेस के प्रदर्शन में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी को पुलिस ने जैसे घसीटा वो भी सबने देखा, कांग्रेस नेता गौरव गोगोई के साथ भी पुलिस ने काफी धक्का मुक्की की. जब नेताओं के साथ पुलिस का रवैया बर्बरतापूर्ण कहा जा सकता है तो कार्यकर्ताओं की तो बात ही छोड़िए.वैसे किसानों को दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए पुलिस ने जिस तरह से सड़कों को खोद कर खाई बनाई,कंटीले तारों से घेरेबंदी की और बीच सड़क पर कीलें लगाई वो तो अलग ही स्तर की बात थी. कहने का मतलब ये है कि पिछले कुछ सालों में सरकारें विरोधियों के ख़िलाफ़ पुलिस का जैसा इस्तेमाल कर रही है और जिस तरह से शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को होने से रोका जा रहा है,जिस तरह से शांतिपूर्ण चल रहे प्रदर्शनों को रौंदा जा रहा है उसे देखकर हर किसी के जेहन में लोकतंत्र को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. भारत जैसे देश में जहां आज़ादी के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन को ही हथियार के रुप में इस्तेमाल किया गया हो वहां आंदोलनों को बलपूर्वक कुचलने का ये नया ट्रेंड ख़तरनाक रूप ले चुका है. जब देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है तो ये उम्मीद की जानी चाहिए कि देश की सरकार और उसके प्रशासनिक तंत्र को आज़ादी के सबसे ख़ूबसूरत हथियार शांतिपूर्ण आंदोलन की ताक़त को न सिर्फ समझना चाहिए बल्कि लोकतंत्र के लिए उसकी ज़रूरत को मानते हुए आंदोलनों के प्रति अपने रवैयै में सुधार भी करना चाहिए.

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