कोलकाता। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सामने राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है। पार्टी न केवल आंतरिक टूट का सामना कर रही है, बल्कि संगठन और संसदीय मोर्चों पर भी दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। विधानसभा चुनावों के बाद से जारी उठापटक के बीच पार्टी के राज्यसभा में घटते प्रभाव और समानांतर संगठन के उदय ने नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है। यह स्थिति न केवल पार्टी की एकता पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि राज्य की राजनीति में टीएमसी के भविष्य को लेकर भी अनिश्चितता पैदा कर रही है।
राज्यसभा में घटता संख्या बल और बढ़ती चुनौती
तृणमूल कांग्रेस के लिए उच्च सदन में अपनी स्थिति बचाए रखना कठिन होता जा रहा है। हाल ही में तीन सांसदों के इस्तीफे और भाजपा में शामिल होने के बाद पार्टी को तगड़ा झटका लगा है। चर्चाएं हैं कि रुक्मणी मलिक समेत कुछ अन्य सांसद भी पार्टी छोड़ने की कगार पर हैं। यदि आने वाले दिनों में और इस्तीफे होते हैं, तो राज्यसभा में टीएमसी का संख्या बल काफी कम हो जाएगा, जिससे संसद में पार्टी का प्रभाव सीमित होना तय है। अब तक लगभग 20 सांसद पार्टी छोड़ चुके हैं, जो नेतृत्व के प्रति बढ़ते असंतोष को दर्शाता है।
ऋतव्रत बनर्जी गुट का समानांतर संगठन
पार्टी के भीतर संगठनात्मक स्तर पर दो धड़े बन गए हैं। ऋतव्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट खुद को 'असली तृणमूल' घोषित करते हुए तेजी से अपनी जड़ें जमा रहा है। इस गुट ने न केवल अपनी वर्किंग कमेटी बनाई है, बल्कि चुनाव आयोग को भी इसकी औपचारिक जानकारी दे दी है। तपासिया में हुई बैठकों के माध्यम से यह गुट अब जिला और ब्लॉक स्तर पर नई नियुक्तियां कर अपनी समानांतर सत्ता खड़ी करने में जुटा है। विधायक अरूप राय को चेयरपर्सन बनाकर इस खेमे ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को सीधी चुनौती दे दी है।
चुनाव आयोग में नाम और चुनाव चिह्न की जंग
संगठनात्मक ढांचे के बाद अब यह लड़ाई चुनाव आयोग की दहलीज तक पहुँच गई है। पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर मालिकाना हक को लेकर दोनों गुटों के बीच कानूनी खींचतान जारी है। जहाँ एक तरफ कालीघाट गुट पार्टी के पुराने ढांचे को बचाने की जद्दोजहद में लगा है, वहीं बागी गुट कानूनी और सांगठनिक दोनों स्तरों पर घेरने की रणनीति अपना रहा है। यदि यह गतिरोध बना रहता है, तो आगामी दिनों में टीएमसी के भीतर नेतृत्व और वैधता की यह लड़ाई राज्य की राजनीति की दिशा पूरी तरह बदल सकती है।

